मध्यप्रदेश राज्य के जिला छिंदवाड़ा में प्राकृतिक परिवेश में लगने वाला सुप्रसिद्ध मेला मेघनाथ मेला है। मेघनाथ मेला जैसा ही एक अन्य प्रसिद्ध रैनीधाम मेला, बुर्रीकला, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश | बुर्रीकला का रैनीधाम मेला, छिंदवाड़ा (RainiDham Mela, Burrikala, Chhindwara, Madhya Pradesh) भी है।
प्रसिद्ध मेला पहाड़ों की उंचाई में भक्तों के साथ लगने वाला रैनीधाम मेला, बुर्रीकला बहुत ही अद्भुत और विशाल होता है। छिंदवाड़ा जिले में रैनीधाम मेला, बुर्रीकला आदिवासी बहुल क्षेत्र में भरने वाला मेला अद्भुत मेला है।
छिंदवाड़ा जिले के विकासखंड जुन्नारदेव की ग्राम पंचायत बुर्रीकला से 3 किलोमीटर की दूरी पर रैनीधाम मेला, बुर्रीकला में लगता है। रैनीधाम मेला, बुर्रीकला होली से 7 दिवस के लिये भरता है।
वास्तव में रैनीधाम मेला, बुर्रीकला आदिवासियों का मेघनाथ मेला अर्थात खंडेरा बाबा का मेला है। गोंड जनजाति जिन की भाषा तमिल भाषा से मिलती जुलती है। संभवत यह जाति दक्षिण से मध्यप्रदेश के वन क्षेत्र में काफी समय पूर्व आकर निवास करने लगी।
यह गोंड जनजाति स्वयं को रावण वंशी मानती है। गोंड जनजाति के लोग जिन-जिन गांवों में निवास करते हैं, वहां खंडेरा बाबा का मेला या चैतगल का मेला अथवा मेघनाथ मेला होली के बाद पंचमी से मनाया जाता रहा है।
पूर्व में मेघनाथ मेला जिले के प्रायः सभी ग्रामों में आयोजित होता था। परंतु अब धीरे-धीरे मेघनाथ मेला का आयोजन कम होते जा रहा है। परंतु अभी भी जिले के कुछ प्रमुख गांव ऐसे हैं, जहां मेघनाथ वीर को पूजने का यह मेघनाथ मेला आज भी धूमधाम से मनाया जाता है।
मेघनाथ मेला आसपास के गांव के गोंड जनजाति के लोग स्थल पर आकर मां निकुंभला देवी की तथा रावण के वीर पुत्र मेघनाथ की पूजा अर्चन करते हैं।
मेघनाथ मेला जुन्नारदेव विकासखंड के रैनी ग्राम में लगने के कारण रैनीधाम मेला, बुर्रीकला के नाम से जाना जाता है। जबकि दोनों मेलों का आयोजन व स्वरूप एक जैसा ही है।
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रैनीधाम मेला, बुर्रीकला में आस-पास ग्रामों के अतिरिक्त बैतूल, छिंदवाड़ा, परासिया, तामिया से श्रद्धालु मेले में भाग लेने आते हैं। शहरी क्षेत्र के लोगों द्वारा भी मेला आकर्षण का केंद्र बन गया है।
स्थानीय परंपरा अनुसार श्रद्धालु यहां पहुंचकर रैनीधाम मेला, बुर्रीकला में खंडेरा बाबा अर्थात मेघनाथ व बड़ा देव महादेव की पूजन करते है एवं अपनी अपनी इच्छा व्यक्त कर मन्नत मांगते हैं।
जिनकी मन्नत पूरी हो जाती है। उन्हें वीर कहते हैं। परंपरा अनुसार वीर द्वारा मेले के पांचवे दिन पंचमी को पूजन अर्चना व बलि अर्पित की जाती है। मन्नत मांगने वाले वीर बकरा या मुर्गा भी लाते हैं।
रैनी धाम के इस रैनीधाम मेला, बुर्रीकला की मान्यता भी इसलिए अधिक है कि पूजन स्थल पर एक प्राचीन वृक्ष आज भी वैसे का वैसा ही है।
यहां जनश्रुति है कि इस वृक्ष को काटने से कभी खून की बूंदे निकली थी। अतः इस स्थल को सिद्ध एवं जागृत देवी शक्ति स्थल के रूप में पूजा की जाती है।
पहले यहां रैनीधाम मेला, बुर्रीकला में सीमित दुकानें रहती थी। परंतु अब स्थानीय व बाहरी दुकानों की संख्या काफी बढ़ गई है। रैनीधाम मेला, बुर्रीकला की व्यवस्था समिति द्वारा ग्राम पंचायत पुलिस व राजस्व विभाग के सहयोग से की जाती है।
पानी की व्यवस्था टैंकरों द्वारा की जाती है। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर रैनी धाम सतपुड़ा की सुरम्य वादियों में स्थित है। यहां पहाड़ियों पर बड़े-बड़े पत्थरों की शिलायें विभिन्न आकृतियों की है।
रैनीधाम मेला, बुर्रीकला में एक पत्थर ऐसा भी है जिसे ठोकने पर घुंघरू जैसी आवाज भी निकलती है। रैनीधाम को आकर्षक बनाने के लिए ग्रामीणों द्वारा जन सहयोग से इन विशाल पत्थरों पर प्राणियों की आकर्षक आकृति बनाई गई है।
विगत कुछ वर्षों से शिक्षकों की समिति मेला स्थल पर रंग पंचमी में श्रद्धालुओं के लिए विशाल भंडारा आयोजित कर रही है।
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