जिला छिंदवाड़ा के रामाकोना में संत एकनाथ षष्ठी मेला प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है।
संत एकनाथ भगवान विट्ठल रुक्मणी के अनन्य भक्त थे। विट्ठल याने भगवान कृष्ण, मराठी क्षेत्र में उन्हें विठोबा या पांडुरंग भी कहते हैं। भगवान विट्ठल रुक्मणी का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र राज्य के पंढरपुर में है।
महाराष्ट्र संतों की भूमि है, जहां अनेकों प्रसिद्ध संतों ने जन्म लिया। यहां संतों की परंपरा सी रही है, जैसे संत ज्ञानेश्वर, श्री समर्थ रामदास, श्री गजानन महाराज, संत तुकाराम, संत ज्ञानदेव, संत नामदेव, संत गोरोबा, संत सेन महाराज, संत एकनाथ आदि।
इसी संत परंपरा में एक पुराना नाम है भक्त पुंडलिक। जो छठवीं सदी में हुए हैं। वह अपने माता-पिता के परम भक्त थे। साथ ही भगवान कृष्ण इनके इष्ट देव थे।
जिनकी भक्ति में संत एकनाथ लीन रहते थे। संत एकनाथ की भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन श्री कृष्ण रुक्मणी के साथ प्रकट हो गए।
भगवान ने स्नेह से पुकार कर कहा पुंडलिक हम तुम्हारा आतिथ्य ग्रहण करने आए हैं। उस समय भक्त पुंडलिक अपने पिताजी के पैर दबा रहे थे।
कुंडलिक ने उनसे कहा कि मेरे पिताजी शयन कर रहे हैं, इसीलिए आप रुकिये। और एक ईंट उनकी ओर सरका कर प्रतीक्षा करने के लिए कहा।
पुनः कुंडलिक अपने पिताजी के पैर दबाने में लीन हो गए। इधर भगवान ने भक्त की आज्ञा का पालन किया। और कमर पर दोनों हाथ रख कर एवं पैरों को जोड़कर ईंट पर खड़े हो गए।
तबसे ही भगवान विट्ठल रुक्मणी का यही विग्रह प्रसिद्ध है। कालांतर में यह स्थान भक्त पुंडलिक के नाम से पुंडलिकपुर, अब वर्तमान में पंढरपुर के नाम से विख्यात है।
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माना जाए तो वारकरी संप्रदाय के प्रथम पुरुष संत पुंडलिक ही थे। संत ज्ञानेश्वर महाराज ने वारकरी संप्रदाय की संत परम्पराओं की स्थापना की। वारी का अर्थ है यात्रा करना।
जो अपने आस्था स्थान की भक्ति पूर्ण पैदल यात्रा बार बार करता है, उसे वारकरी कहते हैं। भगवान विट्ठल की भक्ति को वारकरी कहते हैं, एवं इस संप्रदाय को वारकरी संप्रदाय कहते हैं।
पंढरपुर की वारी (यात्रा )आषाढ़ शुक्ल एकादशी से आरंभ करते हैं। इसमें मुख्य रूप से आषाढ़, कार्तिक, माघ व चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पंढरपुर की यात्रा की जाती है।
मान्यता है कि एकादशी के दिन भगवान विट्ठल (पांडुरंग अर्थात विठोबा) अपने भक्त पुंडलिक से मिलने पंढरपुर आते हैं।
यह भी मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव जी भी अपने परिवार सहित भगवान विट्ठल के दर्शन करने आते हैं। उन्होंने ही प्रथम पंढरपुर की वारी (यात्रा) का आरंभ किया।
संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव, संत एकनाथ, संत तुकाराम आदि वारकरी संप्रदाय के प्रसिद्ध संत हैं।
वारकरी (पंढरपुर की पैदल यात्रा करने वाला भक्त) धोती अंगरखा, ऊपरना तथा टोपी पहने हुए, कंधा पर भगवा रंग की ध्वजा, गले में तुलसी माला, हाथ में वीणा तथा मुख से विट्ठल हरि का नाम संकीर्तन करते हुए वारी (पैदल यात्रा) के लिए निकलता है। वारकरी मस्तक, गले, छाती, छाती के दोनों ओर, दोनों भुजाओं, कान व पेट पर चंदन लगाता है।
ऐसे ही वारकरी संप्रदाय के संत बंधु श्री हीरामन जी एवं श्री वाता जी महाराज का आगमन, आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व छिंदवाड़ा जिले के ग्राम उटेकाटा में हुआ।
(फोटो द्वारा - श्री दिनकर पातुरकर जी)
जन श्रुति अनुसार हीरामन महाराज महाराष्ट्र के भागी माहरी गांव के रहने वाले थे। बचपन में माता पिता का स्वर्गवास हो जाने के बाद, छोटे भाई वाताजी की जिम्मेदारी उन पर आ गई।
वे अपनी आजीविका मजदूरी व भजन कीर्तन के सहारे चलाते थे। ऐसे ही भजन कीर्तन व धार्मिक कार्यक्रमों के चलते दोनों भाई रामाकोना के पास ग्राम उटेकाटा में आकर बस गए।
ग्राम उटेकाटा में हीरामन जी एक खेत मालिक के यहां कार्य करने लगे। दोनों भाई आसपास के ग्रामों में भगवान विट्ठल हरि के भजन संकीर्तन करने जाते थे।
एक बार खेत मालिक द्वारा किसी कारणवश आरोप लगाया जाकर, उन्हें प्रताड़ित किये जाने पर, उनका मन उचट गया। और वे अपने छोटे भाई को लेकर रामाकोना आकर रहने लगे।
दोनों भाई का प्रतिवर्ष कार्तिक माह में भक्ति भाव से भगवान विट्ठल रुक्मणी के दर्शन हेतु पंढरपुर पैदल यात्रा वारकरी करने का नियम था।
जनश्रुति अनुसार एक बार भगवान विट्ठल ने संत हीरामन को स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि मैं फागुन कृष्ण षष्ठी को 3 दिन के लिए पंढरपुर से रामाकोना तुम्हारे पूजा स्थल आऊंगा।
स्वप्न में भगवान के वचनों को आशीर्वाद समझ दोनों भाई रंग पंचमी का इंतजार करने लगे। भगवान के दर्शन की बात चारों तरफ फैल गई । हजारों भक्त कन्हान नदी के किनारे संत हीरामन के पूजा स्थल के पास इकट्ठे हो गए।
भगवान विट्ठल ने संत हीरामन महाराज को दर्शन दिए। और कहा कि नदी से एक घड़ा रेत और एक घड़ा पानी ले आओ और मेरे नाम का स्मरण कर प्रसाद भक्तों में बांट दो।
ऐसा ही किया गया रेत शक्कर में और पानी घी में परिवर्तित हो गया। सभी उपस्थित भक्तों ने घी शक्कर का प्रसाद ग्रहण किया। और तभी से फागुन कृष्ण षष्ठी में भगवान विट्ठल की पूजा एवं भजन कीर्तन का क्रम प्रारंभ हुआ।
कालांतर में संत हीरामन एवं संत वाता जी महाराज की स्मृति में यह धार्मिक कार्यक्रम एक विशाल मेले के रूप में परिवर्तित हो गया। जिसे आज संत एकनाथ षष्ठी मेले के रूप में जानते हैं।
ग्राम वासियों की चर्चा अनुसार रामाकोना का संत एकनाथ षष्ठी मेला लगभग 400वर्ष पुराना है। श्री आर.व्ही.रसैल ICS(आई.सी.एस) ने छिंदवाड़ा जिले के गजेटियर सन् 1907 ईस्वी में रामाकोना के षष्ठी मेले का उल्लेख किया है।
तदनुसार " स्थानीय कुनबी संत हीरामन ने पंढरपुर से श्री विट्ठल भगवान का चित्र यहां कन्हान नदी के किनारे लाकर स्थापित किया। संत हीरामन लगभग 50 वर्ष पूर्व हुए हैं। "
अतः गजेटियर प्रकाशित सन् 1907ई.के अनुसार, आज से लगभग 175 वर्ष पूर्व संत हीरामन हुए हैं। एवं षष्ठी पूजन का धार्मिक कार्यक्रम लगभग 175 वर्ष पूर्व के आसपास प्रारंभ हुआ।
धीरे-धीरे यह धार्मिक कार्यक्रम संत एकनाथ षष्ठी मेला के रूप में परिवर्तित हो गया। जिला गजेटियर अनुसार " रामाकोना में यह मेला लगभग 5 दिनों के लिए लगता था।
मेले में लगभग 10,000 से 20,000 तक श्रद्धालु आते एवं कन्हान नदी में स्नान करते थे। दही हांडी फोड़ी जाती थी।
संत एकनाथ षष्ठी मेला में लगभग 300 दुकानें लगती थी। मेले में आभूषण, कपड़े, किराना, प्रसाधन सामग्री आदि की दुकानें आती थी। खेल, तमाशे, सर्कस, झूला भी आते थे। इसके अलावा पशु भी विक्रय हेतु आते थे। मेले में आसपास के व्यापारी बड़ी संख्या में आते हैं।"
वर्तमान में यहां संत एकनाथ षष्ठी मेला विशाल रुप में 7 दिवस के लिए लगता है। सात दिवस तक चलने वाले षष्ठी महोत्सव मेले में प्रतिदिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में भगवान विट्ठल की कांकड़ा आरती होती है। तत्पश्चात विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ होता है, भजन होते हैं। विभिन्न भजन मंडलियों द्वारा भजन कीर्तन होता है।
ग्रंथ ज्ञानेश्वरी का पारायण भी होता है। भजन संकीर्तन उपरांत गोपाल काला दही लाही प्रसाद का वितरण किया जाता है। श्री पालखी, ग्राम के सभी मंदिरों एवं मार्गों से होती हुई कन्हान नदी तक जाती हैं।
श्री पालखी के एक दिन पूर्व कन्हान नदी में संत लीलामृत घाट पर संत मिलन समारोह भी होता है।
आसपास गांवों से एकत्रित मधुकरी का महाप्रसाद वितरण किया जाता है। इस प्रकार षष्ठी महोत्सव के अंतर्गत उपरोक्त समस्त धार्मिक क्रियाकलाप संपन्न होते हैं। पूरा वातावरण धार्मिक भक्ति भाव मय हो जाता है।
श्रद्धालु भगवत पूजन के साथ साथ संत एकनाथ षष्ठी मेला का भी आनंद उठाते हैं। मेले में आसपास के ग्रामों के अतिरिक्त नागपुर, भंडारा व महाराष्ट्र के अन्य जिलों से भी वारकरी संप्रदाय के हजारों भक्त सम्मिलित होने आते हैं। इस प्रकार क्षेत्र का यह सबसे बड़ा मेला संत एकनाथ षष्ठी मेला है।
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