सांख में आयोजित होने वाला डोंगर देव मेला, छिंदवाड़ा जिले के प्रसिद्ध मेलों में से एक है।
इसके अलावा बहुत सी भिन्न भिन्न आकार की समूह में शिलाएं है। यह सभी पत्थर की चट्टानें (शिलाएं) करीब से बहती पेंच नदी के पास ही स्थित है।
एक दूसरे से लगकर टिकी हुई यह शिलाएं है। जनश्रुतियों में मान्यता है कि इन शिलाओं के बीच से निकलने पर लोगों के पाप धुल जाते हैं एवं मनोकामना पूर्ण होती है। जो नहीं निकल पाता है। वह पाप का भागीदार माना जाता है।
इसके पास में ही एक शिव मंदिर है। मान्यता है कि शिव मंदिर में नारियल का प्रसाद चढ़ाना पड़ता है।
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डोंगर देव मेला लगभग 100 वर्षों से लग रहा है। मेले का प्रबंधन वन विभाग की ग्राम वन समिति द्वारा किया जाता है।
राज्य के राजस्व विभाग, पुलिस विभाग एवं वन विभाग, ग्राम पंचायत के सहयोग से डोंगर देव मेले में समस्त व्यवस्थाएं की जाती है।
डोंगर देव मेले के नाम से प्रसिद्ध यह मेला प्रतिवर्ष दीपावली के पश्चात देवउठनी ग्यारस से 15 दिवस के लिए भरता है।
डोंगर देव मेले में आसपास के ग्रामों के ग्रामीणों के अतिरिक्त चौरई, छिंदवाड़ा, अमरवाड़ा, सिवनी, बादलपार आदि क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में ग्रामीण आते हैं।
(नदी के किनारे स्थित पेड़ की आकर्षक जड़)
डोंगर देव मेले में सभी प्रकार की दुकानें जैसे पूजा सामग्री, मिठाई, सौंदर्य प्रसाधन सामग्री, रेडीमेड कपड़े, खिलौने आदि दुकानों के अलावा झूला, खेल, तमाशे, सर्कस दिखाने वाले भी आते हैं।
डोंगर देव मेले में आसपास क्षेत्र से प्रतिदिन 10,000 से 15,000 लोग धार्मिक पूजन एवं घूमने वह भ्रमण करने आते हैं।
पिछले कुछ वर्षों से डोंगर देव में भागवत कथा का भी आयोजन किया जा रहा है। ग्रामीण, भक्ति भाव से भागवत कथा सुनने आते हैं।
डोंगर देव, जंगल की हरियाली में स्थित एक अच्छा पर्यटन स्थल है। जहां बड़े-बड़े विशाल शिलाएं इस स्थल के आकर्षण का बड़ा केंद्र है।
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