आज के लेख में हम बात करेंगे एक ऐसी नदी सीतारेवा नदी की जिसका नाम मां जानकी या सीता जी के नाम से प्रभावित है। सीतारेवा नदी, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश (SitaRewa River, Chhindwara, Madhya Pradesh)।
यहां स्थित पर्वत श्रेणी से ही सीतारेवा नदी का उद्गम हुआ है। इस क्षेत्र के ग्राम कामथा भैंसखोह व गुड़ीविरथा के बीच स्थित पहाड़ी क्षेत्र से सीतारेवा नदी निकली है।
जिले के उत्तरी क्षेत्र में पश्चिम से कुछ पूर्व चलकर, ग्राम चिलक के पास, ग्राम बालूसार के समीप से बहती है सीतारेवा नदी।
फिर आगे बढ़ते हुए ग्राम बालूसार के समीप, लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर 120 फीट की ऊंचाई से छिन्दवाड़ा जिले का सबसे बड़ा व खूबसूरत जलप्रपात बनाती है।
यहां का मनमोहक एवं नयनाभिराम दृश्य मन को प्रफुल्लित कर देता है। इस जलप्रपात को गलालिया जलप्रपात के नाम से जाना जाता है।
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सीतारेवा नदी आगे बहती हुई छिंदवाड़ा-नरसिंहपुर मार्ग पर हर्रई के आगे ग्राम परतापुर के पश्चिमोत्तर बहने के पश्चात सीतारेवा नदी, छिंदवाड़ा जिले की सीमा से नरसिंहपुर जिले की सीमा में प्रवेश करती है।
सीतारेवा नदी, नरसिंहपुर जिले मेें बहती हुई लोखीपार ग्राम के आगे जाकर नर्मदा नदी में जा मिलती है।
स्थानीय जनश्रुति यह भी है कि सीतारेवा नदी विश्व की पहली ऐसी नदी है। जिसमें नांव नहीं उतारी जाती है। आश्चर्यजनक है।
सीतारेवा नदी में न ही किसी शव को प्रवाह किया जाता है। मान्यता है कि ऐसा किया तो नदी में बाढ़ आ जाती है और फिर आस-पास में बसे गांवों के डूबने का खतरा पैदा हो जाता है।
विज्ञान के इस आधुनिक युग में भले ही नई पीढ़ी मान्यता को न माने लेकिन पुरानी घटनाएं इस बात की पुष्टि करती हैं। वर्तमान में लोग अभी भी नदी के लिए तय की गई मर्यादा का पालन करते आ रहे हैं।
सीतारेवा नदी के किसी भी घाट पर नाव नहीं चलाई जाती है जैसा कि स्थानीय मान्यता है। यहां बाढ़ के हालात में भी शाम तक नदी के पानी का स्तर कम हो जाता है।
सीतारेवा नदी पर बालूसार के पास 15 मेगावाट का विद्युत उत्पादन का निजी हाइड्रल प्रोजेक्ट प्रस्तावित है।
ग्राम परतापुर के आगे ग्राम गढ़ागढ़ से 0.5 किलोमीटर अंदर एक छोटा सा जलप्रपात भी दर्शनीय है। इसे घोघरा जलप्रपात के नाम से जाना जाता है।




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